Friday, April 10, 2020

आम आदमी के पास पैसा क्यों नहीं रूकता?



- पार्श्वभूमी

भाईयों, पुरे दुनिया कि अर्थव्यवस्था एक ऐसे मायाजाल से बुनी हुई है कि आम आदमी के पास पैसा रूकेगा हि नही। हम हमारा देश भारत के बारे में बात करते है, आजादी के पहले हमारा देश एक खेतीप्रधान देश था। छोटे छोटे कसबे, गाँव हुआ करते थे। हर कोई अपनी जिंदगी गुजारणे के लिए खेती और उसके अनुषंगिक काम करता था। हर गाव अपने आप में स्वयंपूर्ण हुआ करता था। लोगों कि जरूरते कम थी, और जादातर खाने पिने के बारें में थी। रोटी,कपडा, मकान, हवा पाणी। भारत कि क्रुषक संस्कृती थी, जो स्वयंपूर्ण थी तो बाहर से जादा कुछ नहीं आता था, मतलब गाँव कि कमाई गाँव में रहती थी। इसके जातीव्यवस्था जैसे कुछ बुरे पहलू भी थे। आजादी के बाद हमारे नेताओंने इस व्यवस्था को सुधारने के बजाए गिराने में विश्वास किया। ग्रामीण और खेतीप्रधान अर्थव्यवस्था सुधारते समय औद्योगिकरण करना बिलकुल मुश्कील नहीं था। लेकिन ग्रामीण खेतीप्रधान व्यवस्था को गिराकर हि औद्योगिकीकरण किया गया। जिसकी झलक अजतक हम देख रहे है। परिणाम स्वरूप समाज में अर्थ विषमता कि दरी बढ गयी। और दुर्भाग्य से जो बढती हि जा रही है। मुझे यहाँ पे यह स्पष्ट करना बहुत जरूरी है कि मैं मेरी जिंदगी में मै कभी भी समाजवाद का बिलकुल समर्थक नहीं रहा, लेकिन हर भारतीय को समान संधी मिलनी चाहिए, तभी जाकर एक राष्ट्रप्रेमी समाज बन सकता है यह मेरा मानना है।

- संपत्ती कमाने के अवसरोंकी विषमता

आजादी के बाद भारत में  इंडस्ट्री को बढावा दिया गया और वह जरूरी भी था, समय के हिसाब से भूमिहीन, बेरोजगार लोगों को रोजगार देना सरकार कि प्राथमिकता थी, और वह बिलकुल सही भी था। सरकारी निती के हिसाब से खेती के उपर जो पूरी आबादी जी रही थी उसको औद्योगिक कारखानों मे शिफ्ट करके शहरी सुविधाओंको बढावा दिया जा रहा था। अभी भी किसी को कोई शिकायत नहीं थी। भारत एक बंदिस्त अर्थ व्यवस्था थी। शहरी और ग्रामीण पायाभूत सुविधा जैसे रस्ते, इलेक्ट्रीसिटी, रेल्वे, बसेस, स्कूल, उच्चशिक्षा, युनिव्हर्सिटीज सबका निर्माण सरकारी पैसों से शहरों में किया गया। आज भी कितने दूरदराज के इलाकों में ट्रान्सपोर्ट और शिक्षा का आकाल है। परिणाम यह हुआ कि शहरी मध्यमवर्गीय लोगों को आगे बढने खुद कि तरक्की करने कि पुरी सुविधाएँ मिल गयी। मैं यहाँ पे बस इतना कहना चाहता हूँ कि यह सब सुविधाओंका निर्माण शहरों के साथ साथ गाव गाव होना चाहिए था। जो नहीं हुआ, बस गरीबी हटाव के नारे लगते रहे। परिणाम स्वरूप गाँव वाले, कम आमदनीवाले दूर दराज के लोगों के संपत्ती कमाने के अवसरोंका अपहरण सरकारी पैसों से होता रहा। मैं किसी भी सुरत में कोई भी मुफ्तवाद का समर्थन नही करता हूँ। लेकिन अवसर तो सबको मिलना चाहिए हि चाहिए ना? दुर्भाग्यवश जो नही मिल पाया।  ९० के दशक में जो ग्लोबलायझेशन हुआ, भारत भी उसमें सामिल हो गया। अतः खासगीकरण का दौर चल पडा। सब पायाभूत सेवा सुविधा जैसे शिक्षा, इलेक्ट्रिसिटी, रस्ते, भांडवल आदी। सब जगह रूपयाने अपना रंग दिखाना चालू कर दिया। इन सब हडबडी में ग्रामीण, कम इनकमवाले कामगार पिछड गये। सरकारने बडी चालाकी के साथ बेसिक चीजों का खासगीकरण कर दिया। शिक्षण, वैद्यकीय सुविधा, ट्रान्सपोर्ट इ.। जब किसी को अच्छी शिक्षा नहीं मिल पाएगी तो अर्थार्जन का विशेष ज्ञान हासिल नहीं कर पाएगा। और अपने आप  हालात कि चक्की में पिसता चला जाएगा। दुसरी ओर कमी आमदनी में गुजारा करने लिए बाध्य परिस्थिती में खानपान में जरूरी चीजें नहीं होगी तो अपने आप खासगी अस्पतालों में धकेला जाएगा। गाँव कसबों में रोजगार नहीं होने कि वजह से शहरी झोपडपट्टी में आएगा और शहरी पैसोवालोंके लिए एक सस्ता मजदूर, व्यापारीओंके लिए एक कस्टमर, स्कूलवालों के लिए स्टुडंट मिल जाएगा। मतलब यह दुनिया सिर्फ और सिर्फ एक बाजार है। कहीं भी जाओ हर इन्सान एक ग्राहक मात्र है। और ग्राहक कि क्षमता मापने का मापदंड है खरेदी क्षमता। खरेदी के लिए चाहिए होता है पैसा!  जो आम आदमी के पास एक तो आता नही और आया तो रूकता नही है। और इन सबकी वजह है अवसरोंकी विषमता। और यह आर्थिक विषमता का मायाजाल बुननेका काम आजादी के बाद बने हर सरकारने बडे चालाकी से किया है।

- रूपया आता कहाँ से है और जाता कहाँ है?

हम सब अपनी जिंदगी जिने के लिए कोई ना कोई काम करने के लिए बाध्य है। और हर कोई अपने हिसाब से हर मुश्कील काम करके पैसा कमाने के पिछे हमेशा पडा रहता है। पैसा आता बहुत मेहनत और इंतजार के बाद, लेकिन खिसकता बहुतही आसानी से और जल्दी है। ऐसा क्यों होता है?
१. पैसा हमेशा अमीरों के पास हि क्यों रूकता है?
२. गरीब आदमी हमेशा पैसे के पिछे भागता हि क्यों रहता है?
३. लक्ष्मीजी को चंचल क्यों कहा जाता है?
४. अमीरोंके अमीर होने का राज क्या है?
५. आम आदमी कभी जरूरत से जादा पैसा कमाकर अमीर बन सकता है या नही?
६. एक साधारण इन्सान को पैसा कमाना है तो क्या करना पडेगा?
७. हमें पढाई में सब कुछ पढाया जाता है, लेकिन पैसा कमाना नहीं क्यों?

भाईयों इन सब बातों पर चर्चा करने हेतू हमने "रूपयाक्लब" का निर्माण किया हुआ हझ। और पुरे भारतवर्ष को फिर से सोने कि चिडिया बनाने के इस मिशन में आप सदैव साथ देंगे यह अपेक्षा करता हूँ।

आपका मित्र

बापू नलगे
पुणे, महाराष्ट्र

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आम आदमी के पास पैसा क्यों नहीं रूकता?

- पार्श्वभूमी भाईयों, पुरे दुनिया कि अर्थव्यवस्था एक ऐसे मायाजाल से बुनी हुई है कि आम आदमी के पास पैसा रूकेगा हि नही। हम हमारा देश भारत...